सिरमौर के ऋषुध ठाकुर स्टैनफोर्ड में कर रहे पीएचडी, सैटेलाइट से करेंगे देवभूमि के जंगलों और जल-स्रोतों की रक्षा
डोर स्कूल ऑफ सस्टेनेबिलिटी की एडवाइजरी काउंसिल में बने छात्र प्रतिनिधि, बिल गेट्स-चंद्रशेखरन के साथ रखेंगे बात
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पांवटा साहिब। देवभूमि हिमाचल की मिट्टी से निकलकर एक युवा आज दुनिया की शीर्ष यूनिवर्सिटी में जलवायु परिवर्तन और जैव-विविधता संरक्षण के लिए काम कर रहा है। जिला सिरमौर के खोदरी माजरी गांव निवासी ऋषुध ठाकुर अमेरिका के स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में पीएचडी कर रहे हैं।
ऋषुध का गांव हिमाचल – उत्तराखंड सीमा पर टोंस और यमुना के संगम पर बसा है। उनके पूर्वज तीन पीढ़ी पहले उत्तराखंड के जौनसार बावर क्षेत्र से यहां आकर बसे थे। बचपन से ही प्रकृति, नदियों और पहाड़ों से लगाव के कारण उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग को चुना। वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से बी.टेक करने के दौरान 2018 की केरल-कर्नाटक बाढ़ ने उनके मन में सवाल जगा दिया – “क्या पहले से बाढ़ संभावित क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है?”
इसी जिज्ञासा में उन्होंने सैटेलाइट इमेजरी और हाइड्रोलॉजी का इस्तेमाल कर कर्नाटक के कूर्ग का बाढ़ नक्शा तैयार किया। इसके बाद आईआईटी रुड़की में रिसर्च इंटर्नशिप के दौरान उन्होंने देवदार, बांज, चिर जैसे पेड़ों की प्रजातियों और जंगलों द्वारा कार्बन भंडारण का सैटेलाइट आधारित नक्शा बनाने पर काम किया।
2021 में ऋषुध ने स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय से एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग में मास्टर्स की। इसी दौरान उन्हें नासा में तीन महीने रिसर्च करने का अवसर भी मिला। वर्तमान में वे स्टैनफोर्ड के जियोफिजिक्स विभाग में पीएचडी कर रहे हैं। उनका शोध सैटेलाइट डेटा के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने और जैव-विविधता को बचाने पर केंद्रित है।
हाल ही में स्टैनफोर्ड ने ऋषुध को दो बड़ी उपलब्धियां दी हैं। एक तो उन्हें विश्वविद्यालय का शताब्दी शिक्षण पुरस्कार मिला, और दूसरा उन्हें डोर स्कूल ऑफ सस्टेनेबिलिटी की एडवाइजरी काउंसिल में 200 से अधिक पीएचडी छात्रों में से दो छात्र प्रतिनिधियों में से एक चुना गया है। इस 22 सदस्यीय काउंसिल में बिल गेट्स, एन. चंद्रशेखरन और जमशेद गोदरेज जैसे लोग भी शामिल हैं। दो साल की इस टर्म में ऋषुध छात्रों की राय विश्वविद्यालय के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाएंगे।
ऋषुध का मानना है कि सैटेलाइट भारत जैसे देशों के लिए वरदान है क्योंकि इससे कम लागत में बड़े क्षेत्र की निगरानी संभव है। वे कहते हैं “जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर हमारे जंगलों और वन्य प्राणियों पर पड़ रहा है, जिस पर अब बात होना जरूरी है।”
पीएचडी पूरी करने के बाद ऋषुध का लक्ष्य भारत लौटकर देवभूमि में रहकर रिसर्च करना और स्थानीय लोगों को इसमें जोड़ना है।
उन्होंने युवाओं को संदेश दिया – “सपने जरूर देखें। रास्ता पता चल जाए तो उस पर लगातार चलते रहें। और हम सबकी जिम्मेदारी है कि हम अपने जंगल-पहाड़, नदियों और संस्कृति को बचाकर रखें। इन्हें सबसे बड़ा खतरा हम इंसानों से ही है।”
ऋषुध अपनी सफलता का श्रेय अपने माता शांति ठाकुर व पिता धनवीर सिंह ठाकुर को देते हैं, जिन्होंने बचपन से ही उन्हें दुनिया और समाज से जोड़कर रखा।
